आर्थिक संकट से घिरे देश में विपक्ष और पत्रकारिता की निगरानी करने की खबर भयानक

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Published: July 20, 2021 01:10 ISTरवीश कुमार

पेगसस जासूसी कांड में पत्रकारों के अलावा अब विपक्ष के नेताओं के भी नाम आ गए हैं. दि वायर ने रविवार के बाद आज एक और रिपोर्ट छापी है जिसमें इसकी पुष्टि की गई है कि जासूसी के लिए 300 फोन नंबरों की एक सूची बनाई गई थी जिसमें राहुल गांधी के भी दो नंबर शामिल हैं. इसी सूची में राहुल से जुड़े 9 और नंबर डाले गए थे लेकिन राहुल ने नंबर बदल लिया था. राहुल ने वायर से कहा है कि उनके व्हाट्सऐप पर अतीत में संदिग्ध मैसेज आए हैं. जासूसी के लिए ही ऐसा किया जाता है. राहुल ने वायर से कहा है कि “यदि आपकी जानकारी सही है, तो इस स्तर की निगरानी व्यक्तियों की गोपनीयता पर हमले से आगे की बात है. यह हमारे देश की लोकतांत्रिक नींव पर हमला है. इसकी गहन जांच होनी चाहिए और जिम्मेदार लोगों की पहचान कर उन्हें सजा दी जाए.” राहुल के अलावा उनके सहयोगी अलंकार सवाई, सचिव राव का नाम भी सूची में है. राहुल गांधी के सात गैर राजनीतिक दोस्तों के भी नाम हैं. 
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ये हुआ है, या ये हो रहा है इस देश में. संकटग्रस्त आर्थिक हालात वाले देश में विपक्ष और पत्रकारिता की निगरानी करने की यह खबर भयानक है. वायर की रिपोर्ट यह भी बताती है कि जासूसी के लिए संभावित लोगों की सूची में पूर्व चुनाव आयुक्त अशोक ल्वासा का भी नाम है. 2019 के लोक सभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी के बारे में अलग राय देने के बाद उनका नाम भी संभावित लोगों में डाला गया था. ममता बनर्जी के निजी सचिव, भतीजे अभिषेक बनर्जी और प्रशांत किशोर के फोन पर भी पैगसस से हमला हुआ है. बीजेपी के नेता प्रह्लाद पटेल की भी जासूसी है, जो केद्रीय मंत्री हैं. बताइए केंद्रीय राज्य मंत्री की भी जासूसी उन्हीं की सरकार करा रही थी? वैसे आप हिन्दी अखबारों में छपी इन खबरों को देखिएगा. ज़्यादातर में इस तरह से छापा गया है कि छप भी जाए और छुप भी जाए. दुनिया के कई न्यूज़ संगठनों के अस्सी से अधिक पत्रकार इतने बड़े पर्दाफाश के नाम पर हवा में मिठाई तो बना नहीं रहे थे.

पेरिस में बिना मुनाफे की पत्रकारिता करने वाली संस्था फॉरबिडन स्टोरीज़ और एमनेस्टी इंटरनेशनल को 50,000 से अधिक फोन नंबरों की सूची मिली है जिनकी निगरानी की गई और की जाने वाली थी. इनमें से 1000 के आस-पास फोन नंबर की ही जांच की जा सकी है. एमनेस्टी ने अपने फोरेंसिक लैब में इन नंबरों की जांच की और दुनिया के 15 समाचार संगठनों से साझा कर दिया. न्यूज़ संगठनों ने अपने स्तर पर भी तमाम सूचियों का परीक्षण किया है. फॉरबिडन स्टोरी ने लिखा है कि 50,000 की सूची से पता नहीं चलता कि किसने नंबर डाले हैं और न ही पता चलता है कि कितने फोन को असल में निशाना बनाया गया. इस सूची में भारत, अज़रबैजान,बाहरेन, कजाकिस्तान, मेक्सिको, मोरक्को, रवांडा, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के लोगों के फोन नंबर हैं. भारत में दि वायर ने इस पर खोजी काम किया है तो अमेरिका में दि वाशिंगटन पोस्ट, pbs frontline, ब्रिटेन में द गार्डियन, फ्रांस के लां मोंद, रेडियो फ्रांस. जर्मनी के एक बेहद प्रतिष्ठित अखबार ज़्यूड डॉयचे साइटुंग, और डी ज़ाइट में छपा है. बेल्जियम के ले स्वा और नैक और इज़राइल के ह-आरेज़ में भी छपा है. लेबनान, हंगरी और मेक्सिको के अखबार में भी यह खबर छपी है. भारत में दि वायर पैगसस प्रोजेक्ट में शामिल है. कई अखबारों ने इस खबर को आधा अधूरा ही छापा है. https://drop.ndtv.com/common/gadgets360/pricee/v2/ndtv-story-amp-mid.html?from=app&native=1&amprefurl=https%3A%2F%2Fndtv.in

हिन्दी अख़बारों और भारतीय अखबारों में इस खबर के न छपने से क्या होता है या आधे अधूरे तरीके से छपने से क्या होता है. यह खबर दुनिया के अखबारों में जिस तरह से छपी है उससे भारत की छवि बेहतर नहीं होती. आप नहीं कह सकते कि दस देशों के अखबार और अस्सी से अधिक पत्रकर मिलकर भारत को बदनाम कर रहे हैं क्योंकि यह पर्दाफाश केवल भारत की सरकार के बारे में नहीं है. 50 देशों के फोन नंबरों के बारे में है. 

कुछ ही दिन पहले अमेरिका के ही आर्सेनल लैब की ही रिपोर्ट छपी जिसे कई हिन्दी अखबारों और चैनलों ने भारत की जनता तक नहीं पहुंचने दिया. आर्सेनल ने फोरेंसिक जांच के बाद बताया कि भीमा कोरेगांव केस के आरोपी रोना विल्सन, सुरेंद्र गाडलिंग, आनंद तेलतुंबडे, स्टेन स्वामी के कंप्यूटर को हैक किया गया, उसमें फर्ज़ी दस्तावेज़ डाले गए और फिर इन सभी को भारत के खिलाफ साज़िश करने और प्रधानमंत्री की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल में सड़ा दिया गया. स्टेन स्वामी की तो मौत ही हो गई. दुनिया भर में छपी पेगसस जासूसी कांड की खबरों में इन लोगों का भी नाम है और कहा गया है कि इनमें से कई लोगों के फोन की जासूसी की गई.ADVERTISEMENThttps://7e7b339b6ff1b5c61e233dc494ce3339.safeframe.googlesyndication.com/safeframe/1-0-38/html/container.html

यह कोई दांत चियारने वाली ख़बर नहीं है.ऐसी ख़बर है कि हलक सूख जाने चाहिए. यह कहानी चोर दरवाज़े से लोकतंत्र को रौंदकर मिट्टी में मिला देने की कहानी है अगर आपने अभी नहीं सुनी और हिन्दी प्रदेश के गांव गांव में नहीं सुनाई तो बीस साल बाद बैक डेट में भी कुछ सुनने सुनाने लायक नहीं बचेंगे. मेरी यह बात लिख कर अपने पर्स में रख लीजिए. 

सन 2018 में गांधी जयंती के दिन वांशिगटन पोस्ट के पत्रकार इस्तांबुल में सऊदी अरब के दूतावास के भीतर जमाल ख़शोग्गी की हत्या हो जाती है. जमाल के फोन को इसी पैगसस के साफ्टवेयर की मदद से ट्रैक किया जा रहा था. पेगसस की कंपनी ने हमेशा इस बात से इंकार किया है कि उसके साफ्टवेयर के इस्तेमाल से जमाल ख़शोग्गी की हत्या हुई है. जबकि ख़शोग्गी और उनकी पत्नी और मंगेतर दोनों के फोन पर पेगसस से हमला हुआ था. मंगेतर ने भी इस रिपोर्ट को लेकर आज ट्वीट किया है. ADVERTISEMENThttps://7e7b339b6ff1b5c61e233dc494ce3339.safeframe.googlesyndication.com/safeframe/1-0-38/html/container.html

पेगसस से फोन की जासूसी का संबंध केवल जानकारी चोरी का नहीं है बल्कि किसी निर्दोष को हत्या के इरादे और आतंकवाद के आरोप में फंसा देने का भी है. वैसे भी सही सूचनाओं के बिना एक नागरिक, नागरिक नहीं होता है. दुनिया भर के अखबारो में अपने लोगों की जासूसी करने वाले देश अजरबैजान और रवांडा के साथ भारत की वाहवाही छपी है अगर आप इसे वाहवाही समझते हैं तो. 

पेगसस जासूसी साफ्टवेयर बनाने वाली कंपनी NSO ने कहा है कि  वह अपना सॉफ्टवेयर केवल सरकारों को बेचती है ताकि आतंकवादी गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके. अगर इस सॉफ्टवेयर से किसी पत्रकार के फोन का डेटा लिया गया है, तो यह चिन्ता की बात है. washington post में NSO के अधिकारी का बयान छपा है कि कंपनी सारे आरोपों की जांच कर रही है अगर सही निकला तो उस देश के साथ अपना करार रद्द कर देगी. NSO यह नहीं बताता कि उसने अपना साफ्टवेयर किस देश को बेचा है. ADVERTISEMENThttps://7e7b339b6ff1b5c61e233dc494ce3339.safeframe.googlesyndication.com/safeframe/1-0-38/html/container.html

दिल्ली के एक खास हलके में रविवार काफी लंबा बीता. इस ख़बर के आने की आशंका में एक रविवार में एक पूरा सोमवार भी बीत गया. सरकार समझ गई कि पूरी दुनिया में सोमवार की सुबह भारत की क्या छवि पेश करने वाली है. इसलिए ख़बरों के छपते ही रविवार 9 बजे रात के बाद एक बयान आता है. अगर आप जार्ज आरवेल की 1984 का हिन्दी अनुवाद नहीं पढ़ रहे हैं और प्राइम टाइम ही देख रहे हैं तो सोचिए जिस संख्या में वायर पत्रकारों के फोन की जासूसी हुई है उससे तो बेहतर होता है कि वायर के दफ्तर में सीधे जासूस ही तैनात कर दिए जाते बस उनकी कॉफी का खर्चा सिद्धार्थ वरदराजन को नहीं देना पड़ता. 

सभी के नाम नहीं बता सकते लेकिन इसकी सूची में  दि वायर के सिद्धार्थ वरदराजन, एम के वेणु, वायर की ही रोहिणी सिंह, जासूसी के समम वायर के लिए काम कर रहीं स्वाति चतुर्वेदी, वायर में कॉलम लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर झा, ईपीडब्ल्यू के पूर्व संपादक परंजॉय गुहा ठाकुरता, टीवी 18 की पूर्व एंकर और द ट्रिब्यून की डिप्लोमैटिक रिपोर्टर स्मिता शर्मा, इंडियन एक्सप्रेस के तब के डिप्टी एडिटर सुशांत सिंह, ऋतिका चोपड़ा, ​​द हिंदू की विजेता सिंह, द पायनियर के जे गोपीकृष्णन, पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा रिपोर्टर सैकत दत्ता ,आउटलुक के पूर्व पत्रकार SNM अब्दी और पूर्व डीएनए रिपोर्टर इफ्तिखार गिलानी, हिन्दुस्तान टाइम्स के प्रशांत झा और शिशिर गुप्ता के नाम शामिल है. पूर्व लोकसभा सांसद और वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय का नाम है. पूर्वोत्तर के फ्रंटियर टीवी की प्रधान संपादक मनोरंजना गुप्ता, बिहार के संजय श्याम और पंजाब के जसपाल सिंह हेरन के नाम भी शामिल हैं. हेरन लुधियाना स्थित पंजाबी दैनिक रोज़ाना पहरेदार के प्रधान संपादक हैं. झारखंड के रामगढ़ के रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और उनसे जुड़े तीन फोन नंबर लीक हुए डेटा में मिले हैं. 

भारत में यह खबर सबसे पहले 31 अक्तूबर 2019 के दिन दस्तक देती है जब इंडियन एक्सप्रेस की सीमा चिश्ती की रिपोर्ट छपी थी, सीमा अब वहां से इस्तीफा दे चुकी हैं. हुआ यूं था कि व्हाट्सऐप कंपनी ने अमेरिका के शहर कैलिफोर्निया में इज़राइल की कंपनी NSO पर मुकदमा किया कि इसने अमेरिका और कैलिफोर्निया के कानून को तोड़ा है क्योंकि व्हाट्सऐप अपने ग्राहकों को गारंटी देता है कि उसके फोन को कोई रिकार्ड नहीं कर सकता. 

तब व्हाट्स एप ने उन सभी उपभोक्ताओं को खुद से बताया कि आपका फोन हैक हुआ है. सीमा चिश्ती ने भारत सरकार के गृह सचिव और टेलिकाम सचिव से जवाब मांगा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.खबर छपने के बाद भारत के पूर्व दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि सरकार ने व्हाट्सऐप से जवाब मांगा है. 

पेगसस की सूची को देखकर लगता है कि जिन पत्रकारों ने सरकार के लिए अपनी पत्रकारिता की कुर्बानी दी, उनके फोन की भी जासूसी की गई. ये एक डॉर्क कॉमेडी के समान है. भारतीय फिल्म शोले के एक रूपक से समझ सकते हैं. जब गब्बर कहता है कि क्या सोचा था सरदार इनाम देगा लेकिन कालिया का फोन ही हैक हो गया.जासूसी की इन किस्मों में पेगसस कांड एक छोटा सा हिस्सा है. जासूसी के और भी तरीके हैं. मेरी इस लाइन पर ज़रूर कोई IPS मुस्कुरा रहा होगा लेकिन मुस्कुराने वाले उस अफसर को भी नहीं पता कि उसका भी फोन हैक हो रहा होगा. 

पैगसस साफ्टवेयर सबसे पहले आपके फोन पर मिस्ड कॉल छोड़ता है और आपके फोन के भीतर एक जासूस बैठ जाता है. यह जासूस आपके फोन के कैमरे को भी ऑन कर सकता है. जिसके ज़रिए दूर बैठा कोई शख्स चुपचाप देख रहा होता है कि आप कहां गए हैं, किससे मिले हैं, किस रास्ते से जा रहे हैं. फोन बंद रहता है तब भी जासूस आपके फोन के ज़रिए सीधा प्रसारण कर रहा होता है. आप व्हाट्सऐप कॉल करते हैं. यह सोचकर कि इसे कोई रिकार्ड नहीं कर सकता लेकिन आपके फोन में बैठा जासूस सारा कुछ रिकार्ड करता है. आने-जाने वाले सारे SMS पढ़ता है. बातचीत सुनता है. फोन की तस्वीरें उड़ा लेता है. फोन में जो फाइल होती है उसे ले लेता है. ईमेल पढ़ लेता है और दूसरी ऐप में घुस जाता है. आप फोन पर क्या क्या सर्च करते हैं, ब्राउज़िंग हिस्ट्री निकाल लेता है. फोन आपका है लेकिन आपकी सूचनाओं का मालिक कोई और है. वही जो आपसे डरा हुआ है और फोन रिकार्ड कर आपको डराता है. 

सोचिए आपके साथ जहां जहां फोन है हर निजी क्षण का वीडियो कोई और देख रहा है. आजकल अभूतपूर्व शब्द काफी चला हुआ है इसलिए यह पर्दाफाश अभूतपूर्व है. बिज़नेस इनसाइडर की बैकी पीटरसन की 6 सितंबर 2019 की रिपोर्ट है कि इज़राइल में एनएसओ जैसी कंपनियों की संख्या दो दर्जन से भी ज़्यादा है जो जासूसी के साफ्टवेयर बनाती हैं. वाशिंगटन पोस्ट ने लिखा है कि पिछले साल NSO का ही मुनाफा 240 मिलियन डॉलर का था. भारतीय रुपये में 1794 करोड़. सोचिए कितना बड़ा धंधा है यह. 

अक्टूबर 2019 में इसे सबसे पहले कनाडा के सिटिजन लैब ने पकड़ा जो यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो का लैब है और व्हाट्सऐप के साथ काम करता है. सितंबर 2018 में कनाडा के साइबर सिक्योरिटी ग्रुप ने कहा कि 45 देशों में 36 पेगसस ऑपरेटर का पता लगा है. इसी लैब ने आर्सेनल  के साथ भी काम किया है जिसकी रिपोर्ट बताती है कि प्रोफेसर आनंत तेलतुंबडे, गाडलिंग, स्टैन स्वामी, रोना विल्सन के कंप्यूटर में जाली दस्तावेज़ डाले हैं. इस बार की रिपोर्ट को भी सिटिज़न लैब ने जांचा परखा है. 

भारत सरकार ने पिछली बार भी व्हाट्सऐप से जवाब मांगा था लेकिन बताना चाहिए कि उसने एनएसओ के इस सॉफ्टवेयर को खरीदा है या नहीं. भारत सरकार के नए आईटी मंत्री ने जवाब दिया. NSO तो एक कंपनी है वह अपनी सफाई में खुद को बेदाग बताएगी ही, उसके बयान के आधार पर भारत सरकार सफाई दे रही है. इतने लंबे जवाब में एक लाइन यह भी हो सकती थी कि पेगसस का सॉफ्टवेयर खरीदा गया या नहीं.

क्या वाकई अवैध रूप से संभव नहीं है? 2019 में तब दिग्विजय सिंह ने राज्यसभा में यह मामला उठाया था. इस बार राजद सांसद प्रोफेसर मनोज झा, आम आदमी के पार्टी के सांसद संजय सिंह ने राज्यसभा में बहस की मांग की है. राहुल गांधी ने दो दिन पहले एक ट्वीट कर पूछा था कि इन दिनों लोग क्या पढ़ रहे हैं, आज राहुल गांधी ने उसी ट्वीट को लेकर फिर से ट्वीट किया है और प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिए बगैर लिखा है We know what he’s been reading- everything on your phone! #Pegasus. मतलब हम जानते हैं कि वे इन दिनों आपके फोन पर क्या पढ़ रहे हैं, हैशटैग पेगसस. कांग्रेस ने आज बीजेपी का नाम ही भारतीय जासूस पार्टी रख दिया. 

यह मामला साधारण नहीं है. Iphone बनाने वाली कंपनी apple ने भी इस खबर पर हैरानी और चिन्ता जताई है. प्रेस क्लब आफ इंडिया ने भी बयान जारी किया है कि विदेशी एजेंसी भारत के नागरिकों की जासूसी में शामिल है. इससे अविश्वास और बढ़ता है. आप जनता से क्या मैं इतना पूछ सकता हूं कि क्या आपके लिए ख़बर लिखने की इतनी बड़ी कीमत चुकानी होगी, अगर अखबार का दाम देकर पत्रकारों के नाम पर गुलामों की लिखी खबर पढ़नी हैं तो आप अखबार क्यों खरीद रहे हैं. क्या आप उस पैसे को मंदिर निर्माण के चंदे में नहीं दे सकते? देखा धर्म की बात की न मैंने. पुण्य मिलेगा. लोकतंत्र का सत्यानाश भी हो जाएगा और मंदिर भी भव्य बनेगा. एक पंथ दो काज. आइडिया अच्छा है न. 

अगर आपको सरकार का ही केवल पक्ष सुनना है तो अखबार की जगह सरकारी होर्डिंग पढ़ा करें जो पेट्रोल पंप पर लगी हुई हैं. पेगसस जासूसी कांड का मामला दुनिया के पचास देशों से जुड़ा है. लोकतंत्र पर हमले की यह खबर व्यापक है और यह हमला केवल फोन की जासूसी से नहीं होता है. सारी बातें एक ही कार्यक्रम में नहीं बता सकते, इस खबर से जुड़ी और बातें सामने आएंगी. एक-एक कर हम बताते रहेंगे कि क्या-क्या छुपाया जा रहा है. 

क्या आप जानते हैं कि मणिपुर के एक्टिविस्ट लीचोबेम एरेन्ड्रो को फेसबुक पर पोस्ट करने के कारण 13 मई को गिरफ्तार कर लिया. 17 मई को लोकल कोर्ट से ज़मानत मिल गई लेकिन तभी ज़िलाधिकारी ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून NSA लगा दिया. एरेन्ड्रो ने इतना लिखा कि गोबर या गोमूत्र से COVID का इलाज नहीं होगा. पुलिस आ गई, जेल ले गई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एरेन्ड्रो को तुरंत रिहा किया जाए. आप नागरिक कुछ मत बोलिएगा, चुप रहिएगा, केवल व्हाट्सऐप में जो वो भेज रहे हैं वही फारवर्ड करते रहिए, लोकंतत्र का क्या है, खत्म हो जाए तो होने दीजिए. पहले खुद को जेल जाने से बचाइये. डरे रहिए, मरे रहिए. इस तरह से आपकी चुप्पी और आपका डर  उस लोकतंत्र को सत्यानाश के करीब ले जाएगी जिसके लिए लोगों ने अपनी जान की कुर्बानी दी. 
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