ईद उल अजहा या बकरीद का अर्थ है बलिदान का पर्व

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ईद उल अजहा या बकरीद का अर्थ है बलिदान का पर्व। लेकिन इस शब्द बकर-ईद में बकर का मतलब बकरा नहीं होता। अरबी भाषा में बकर का अर्थ होता है ऊंट। तो आखिर क्यों मनाते हैं बकरीद का त्योहार और इस दिन कुर्बानी देने के पीछे क्या है वजह ये हम आपको बताते है। इस्लाम ने इस प्राकृतिक ख्वाहिश को पूरा करने के लिए साल में दो अवसर मुकर्रर किए। एक रमजान के रोजों के बाद ईदुलफितर और दूसरी ईदुलअजहा। ये है इबादत का दिन ईद-उल-अजहा को भारतीय उप मह़ाद्वीप में बकरीद या ईदुलजुहा कहते हैं। ईद उल फितर यानी मीठी ईद के 2 महीने 10 दिन बाद मनाया जाता है ईद उल अजहा यानी बकरीद का त्योहार।

इस्लाम के जानकार कहते हैं कि ईद उल अजहा के मौके पर ऊंट, भेड़, बकरा आदि हलाल जानवर की कुर्बानी देना पवित्र माना जाता है। लेकिन जिस जानवर की कुर्बानी दी जाए उसके जिस्म पर कोई नुक्स (ऐब) न हो यानी उसके नाक, कान, आंख और पैर सही सलामत हो क्योंकि बीमार और ऐबदार जानवर की कुर्बानी कबूल नहीं समझी जाती। मगर हमें इसके सही नाम अर्थात ईदुलअजहा की और लौट जाना चाहिए। ईदुल फितर हो या ईदुलअजहा। ये अन्य भारतीय त्योहारों होली, दीपावली, क्रिसमस आदि की तरह अनलिमिटेड फन एंड इंज्वाय जैया त्यौहारा नहीं है। जिस तरह ईद उल फितर (मीठी ईद) की नमाज के बाद गरीबों, मांगने वालों और बेसहाराओं को जकात और फितरा (दान के पैसे) दिए जाते हैं उसी तरह उन्हें `ईद इल अजहा` पर पैसे के अलावा कुर्बानी किए हुए जानवर का मीट भी दिया जाता है।

बकरीद पर कुर्बानी की क्या है अहमियत, जानें

क्यों देते हैं कुर्बानी- पैगंबर इब्राहिम के दौर की बात है। एक बार अल्लाह ने इब्राहिम का इम्तेहान लेने के लिए उनसे अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने को कहा। तब हजरत इब्राहिम ने अपने अजीज बेटे इस्माइल को अल्लाह के नाम पर कुर्बान करने का फैसला किया। उनका बेटा भी इस काम के लिए खुशी-खुशी तैयार हो गया। हजरत इब्राहिम अपने बेटे की कुर्बानी देने ही वाले थे तभी अल्लाह ने उन्हें बताया की वो तो बस उनका इम्तेहान ले रहे थे और वो अपने बेटे की जगह एक भेंड़ को कुर्बान कर सकते हैं। तभी से बकरीद मनाने की शुरुआत हुई। तब से लेकर अबतक हर साल ईद उल अजहा (बकरीद) के मौके पर किसी हलाल जानवर की कुर्बानी दी जाती है। बकरीद हर साल मुस्लिम महीना जुल-हिज्जा के दसवें दिन मनाया जाता है। बकरीद पर कुर्बानी किए हुए बकरे के मीट को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहला हिस्सा गरीबों, मांगने वालों और बेसहारों को दिया जाता है। दूसरा हिस्सा रिश्तेदारों और पड़ोसियों के लिए जबकि तीसरा हिस्सा अपने परिवार के लिए रखा जाता है।.

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