किससे ज्‍यादा परेशान हैं? महंगाई से या महंगाई के समर्थक से?

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किसी दौर में यह बात रही होगी कि महंगाई के सभी विरोधी होते होंगे, लेकिन इस दौर में यह बात सही नहीं है. महंगाई चाहे जितनी बढ़ गई हो लेकिन यह मानना ग़लत है कि सभी एक स्वर से महंगाई के विरोध में है. परेशान सभी हो सकते हैं मगर विरोधी सभी नहीं हैं. यह एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन है. जब मैंने अपने फेसबुक पेज पर लोगों से पूछा कि पेट्रोल और डीज़ल के बढ़ते दामों से जो असर आया है, उसका हिसाब बताएं तो कई हज़ार कमेंट आए. कई लोगों ने कहा है कि अब वे चुप हो गए हैं क्योंकि ज़िक्र करते ही दोस्त उलझ जाते हैं. महंगाई के सपोर्ट में विकास की योजनाएं गिनाने लगते हैं. इस तरह के तर्क देते हैं कि सात लाख की कार ख़रीद ली सौ रुपये का पेट्रोल नहीं ख़रीद सकत. दोस्त गाली देने लगते हैं. कई लोगों ने निजी तौर पर मैसेज किया कि महंगाई से बड़ी तकलीफ है लेकिन उससे भी बड़ी तकलीफ है इसे लेकर न कह पाने की. ज़िक्र करते ही दोस्त, सहकर्मी और रिश्तेदार टूट पड़ते हैं कि मोदी विरोधी हो रहा है, जैसे दूसरी सरकार आएगी तो दाम कम कर देगी.

दो लोग महंगाई को लेकर चुप हैं. एक जो महंगाई से परेशान हैं और दूसरा जिनसे उम्मीद है कि टैक्स घटा कर महंगाई कम करेंगे यानी प्रधानमंत्री. दस महीने से जनता पेट्रोल डीज़ल, सरसों तेल, रसोई गैस, सीमेंट, न जाने कितनी चीज़ों के दाम को लेकर त्राही त्राही कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा. मगर उनकी इस चुप्पी की भरपाई लाखों समर्थकों ने कर दी है. ये समर्थक महंगाई की बात करने वालों को चुप करा देते हैं. उनके तर्क भले ही व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से लिए गए हैं लेकिन महंगाई का ज़िक्र करते ही टूट पड़ते हैं. इन समर्थकों को आप मोदी के समर्थक कह सकते हैं लेकिन इनका एक और नाम है, महंगाई के समर्थक. भारत की राजनीति में जनता के बीच से महंगाई के ऐसे प्रखर समर्थक कभी नहीं हुए.

आप ख़ुद से एक सवाल करें, क्या आप खुल कर लोगों के बीच कह पा रहे हैं कि इस महंगाई ने आपको बर्बाद कर दिया? कहने के पहले क्या आप इसका ध्यान रखते हैं कि आस-पास कोई महंगाई का सपोर्टर तो मौजूद नहीं है? क्या आप ट्रेन में चलते हुए, बस में चलते हुए लोग महंगाई पर बात करना सहज महसूस करते हैं? या महंगाई के सपोर्टर के ख़्याल से चुप हो जाते हैं. कई लोगों ने हमने यह बात कही है कि वे कहें तो किससे कहें, बोलने पर सपोर्टर आ जाते हैं.

2010 में आई फिल्म पिपली लाइव का गाना महंगाई डायन खात जात है, हर राजनीतिक रैलियों में बजने लगा था. 2013 में एक फिल्म आई थी सारे जहां से महंगा, क्या आज ऐसी फिल्म आ सकती है? इस फिल्म का प्रमोशन तारक मेहता का उल्टा चश्मा ने भी किया था. तारक मेहता का उल्टा चश्मा शो के सात साल पुराने एपिसोड देखिए. उसमें महंगाई के कई प्रसंग हुआ करते थे. सोडा की दुकान पर जमा हुए किरदार महंगाई की बात करते थे, सब्ज़ी के ठेले पर महिला किरदार सब्ज़ी के बढ़ते दामों पर कमेंट किया करती थी. सीरीयल के किरदार केंद्रीय बजट पर टिप्पणी करते थे और दिवाली पर 20,000 रुपय तोला सोना होने पर कोसा करती थीं. आज सोना 49000 तोला है. इस एक सीरीयल में महंगाई के कई रेफरेंस आपको मिलेंगे. क्या अब भी इस तरह से कार्यक्रमों में ऐसे प्रसंग होते हैं, आप ही बता सकते हैं.

मेरे फेसबुक पेज पर कई लोगों ने बताया है कि उनकी कमाई घटी है और खर्चा 40 प्रतिशत बढ़ा है. पूरा हिसाब है कि महीने का पेट्रोल 1500 लगता था, अब 2800 लगता है. आम जनता कुछ बोलती नहीं है अगर बोलते हैं तो लोग गलत शब्द का इस्तमाल शुरू कर देते हैं. बाड़मेर के दामा राम ने लिखा है कि पिछले साल खेती में 520 लीटर डीजल चला जिसकी कीमत 41,600 रुपए लगी, वही इस साल 520 लीटर डीजल 54,600 रुपए का आया. लेकिन फसल के दाम वही हैं. गिरिश सोनार्थी का यह कमेंट सोमवार को हुई 256 रुपये की वृद्धि से पहले का है. इन्होंने लिखा है कि रेस्टॉरेंट गैस पहले 900 से 1100 हो गया अब 1700. 1 महीने में लगभग 12 से 15 सिलेंडर पर अब एक्स्ट्रा 9000 का खर्च हो गया है. फिर तेल लगभग 12 15 टीन, ऑइल महाकोश पहले 1300 अब 2400 का हो गया है. इस पर अतिरिक्त खर्च 14700 का हो गया है. पेट्रोल पर लगभग 4-5 हज़ार एक्स्ट्रा ,इस महीने प्रॉफिट ज़ीरो पर आ गई है. मंगलातो प्रजापति ने लिखा है कि सर जी मैं एक मकैनिक हूं और अपनी दुकान से 8 किलोमीटर दूर रहता हूं. पहले ₹200 के तेल में एक हफ्ता चल जाता था, आज लगभग 3:30 पौने ₹400 बैठता है. रही बात महंगाई की तो मार्च 2021 से आज की तारीख तक ऑटो पार्ट्स के रेट में 34% की बढ़ोतरी हो चुकी है. इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं पर पड़ता है जिससे जीवन की गाड़ी खींचना मुश्किल हो रहा है. पहले मैं अपने बच्चे को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया करता था जो कि अब बजट इतना रहा नहीं, अतः नाम कटा कर सरकारी स्कूल में डालना पड़ा और यह मेरी ही नहीं लगभग 80% भारतीयों की यही दशा है. मुंह से बोले ना बोले पर फर्क तो पड़ता है.

प्रजापति ने एक बात कही कि मुंह से बोले न बोले फर्क तो पड़ता है. हमारा ज़ोर इसी पर है कि जब परेशान हैं तो मुंह से क्यों नहीं बोल पा रहे हैं. कई लोगों ने सचेत रूप से कोई राजनीतिक कमेंट नहीं किया है. महंगाई को लेकर गुस्सा तो है लेकिन गुस्सा किससे है यह लिखने से लोग बच रहे हैं. मेरे फेसबुक पेज पर महंगाई की बात करने वाले हर ऐसे कमेंट करने वालों पर महंगाई के सपोर्टर टूट पड़ते हैं. फिर भी सोशल मीडिया से बाहर की जनता इस परेशानी को बयां तो कर रही है लेकिन सावधानी के साथ. नाम नहीं ले रही है. 

महंगाई के कारण लोग प्राइवेट स्कूल से बच्चों के नाम कटाकर सरकारी स्कूल में डाल रहे हैं. फीस न दे पाने के कारण ऐसा करना पड़े, यह कितना अपमानजनक है. महंगाई के कारण छोटे बच्चों को अपने पुराने दोस्तों से बिछड़ना पड़ रहा है. महंगाई ने उनका स्कूल ही बदलवा दिया. डीज़ल के कारण किसानों की बुवाई दस से पंद्रह हज़ार महंगी हो गई है. दाम तो मिलेंगे नहीं तो आने वाले समय में भयंकर घाटा उनका इंतज़ार कर रहा है. महंगाई के असर को हमेशा राजनीतिक समर्थन के घटने बढ़ने में नहीं देखा जाना चाहिए. देखना चाहिए कि लोग इस वक्त किन अनुभवों से गुज़र रहे हैं. एक दिन में व्यावसायिक सिलेंडर 266 रुपया महंगा हो गया. लाखों छोटे दुकानदारों पर दबाव है कि दाम बढ़ाएंगे तो कस्टमर चले जाएंगे और नहीं बढ़ाएंगे तो वही खत्म हो जाएंगे. लोग खुद को असहाय बता रहे हैं. अपील कर रहे हैं लेकिन आक्रोश ज़ाहिर करने से बच रहे हैं.

सरकार के सामने असहाय बताने वाले, अपील की मुद्रा में खड़े ये लोग चाहते हैं कि आक्रोश का प्रदर्शन विपक्ष करे. एक तरह से आक्रोश की आउटसोर्सिग चाहते हैं. महंगाई को लेकर अलग-अलग विपक्षी दलों ने कई प्रदर्शन किए भी हैं, तब भी लोगों का मानना है कि विपक्ष ने कुछ नहीं किया. अगर विपक्ष कुछ नहीं करेगा तो क्या सरकार पेट्रोल के दाम 118 रुपये लीटर कर देगी?

पेट्रोलियम मंत्री कई बार कह चुके हैं कि पेट्रोल और डीज़ल पर से टैक्स कम नहीं हो सकता क्योंकि मुफ्त टीका दिया जा रहा है. मंत्री जी यह नहीं बताते हैं कि टीके का बजट क्या है? पेट्रोल और डीज़ल से कितना टैक्स वसूला गया है और उसका कितना हिस्सा टीके पर ख़र्च हुआ है? सरकार तो यह भी नहीं बताती कि कितने लोगों ने पैसे देकर टीके लगवाए हैं और इसकी कुल राशि क्या है?

मंत्री जी का यह बयान जॉर्ज ऑरवेल के 1984 के एक प्रसंग से मिलता है. इस उपन्यास की एक पंक्ति का ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी किया है. 1984 उपन्यास में ओशीनिया के नागरिकों को टेलीस्क्रीन के ज़रिए सूचना दी जाती है. भारत में आप टेलीस्क्रीन को गोदी मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में चल रहे तमाम संदेशों को कह सकते हैं. जॉर्ज ऑरवेल लिख रहे हैं और आपको सुन कर लगेगा कि अरे ये तो सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ वाला लॉजिक है, कहीं यहीं से तो नहीं आया. 

दिन रात टेलीस्क्रीन से आपके कानों से इसी तरह के आंकड़े टकरा रहे हैं कि पचास साल पहले की तुलना में आज लोगों को अधिक भोजन मिल रहा है, अधिक कपड़े दिए गए हैं, अच्छा घर दिया गया है, मनोरंजन के अच्छे साधन दिए गए हैं. लोगों की उम्र लंबी हो रही है, कम घंटों के लिए काम कर रहे हैं, स्वस्थ्य हैं, मज़बूत हैं, ख़ुश हैं और ज़्यादा बुद्धिमान हैं, बेहतर तरीके से शिक्षित हैं. इसमें एक भी शब्द न साबित किया जा सकता है न ख़ारिज किया जा सकता है.

इस तरह के आंकड़ों से पब्लिक स्पेस को भर दिया गया है, इनके बीच पेट्रोल और डीज़ल से त्रस्त जनता की आवाज़ दब सी गई है. दाम बढ़ने के समर्थन में अजीब अजीब तर्क दिए जा रहे हैं. महंगाई के सपोर्टर चलते फिरते टेलीस्क्रीन बन गए हैं. वे कुछ बड़बड़ाते हैं कि मुफ्त अनाज मिल रहा है, मुफ्त टीका मिल रहा है, मुफ्त बीमा मिल रहा है. इसी देश में करोड़ों लोगों को पोलियो का टीका मुफ्त ही मिला. सबको लगने वाले टीके मुफ्त ही लगते हैं. 2018 की एक खबर है टेलिग्राफ की, मूर्ति पर 3000 करोड़ खर्च करने वाली सरकार पोलियो के टीकाकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं से 100 करोड़ मांगेगी.

मीडिया रिपोर्ट है कि भारत मनीला स्थित एशियन डेवलपमेंट बैंक और बीजिंग स्थित AIIB से करीब 14000 करोड़ का ऋण लेने जा रहा है. सरकार टीका के लिए लोन भी ले रही है, टीका के नाम पर पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स भी ले रही ह. इससे अच्छा होता सभी पैसे देकर ही टीका लगा लेते. सरकार यह भी नहीं बताती कि कितने लोगों ने पैसे देकर टीका लिया है. हम जैसों ने पैसे दिए हैं मगर गिनती में नहीं हैं. इस लोन की क्यों ज़रूरत पड़ी. यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि मानसून सत्र में पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने संसद में बताया है कि 2019-20 में पेट्रोल और डीज़ल से टैक्स के रूप में 1 लाख 78 हज़ार करोड़ आया. 2020-21 में 3 लाख 35 हज़ार करोड़ हो गया है. एक साल में 88 प्रतिशत की वृद्धि होती है फिर भी सरकार टीके के लिए लोन ले रही है?

महामारी से पहले 2018-19 में उत्पाद शुल्क से 2 लाख 3 हज़ार करोड़ जमा हुआ था. इंडियन एक्सप्रेस ने आज संपादकीय में लिखा है कि दो साल में पेट्रोल और डीज़ल से ज्यादातर जमा होने वाला उत्पाद शुल्क में 79 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इस साल अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच 1,71,684 करोड़ जमा हुआ है. दो साल पहले अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच पेट्रोल और डीज़ल से 95,930 करोड़ उत्पाद शुल्क जमा हुआ था.

2018 की तुलना में 2020 में हवाई जहाज़ के ईंधन से जमा होने वाला उत्पाद शुल्क घट गया. 2540 करोड़ से घटकर 779 करोड़ हो गया. अगर आप महंगाई से ज़्यादा महंगाई के सपोर्टर से परेशान हैं तो कोई बात नहीं. जब भी महंगाई के सपोर्टर चुप कराने आएं तो बस इतना याद कीजिए कि क्या कभी आप उनके साथ दूसरों को चुप कराया करते थे, इसका जवाब हां में है तो महंगाई के सपोर्टर का फूलों की माला पहनाकर स्वागत कीजिए. सरकार को भी महंगाई के इन सपोर्टरों का सम्मान करना चाहिए, ये अगर नहीं होते तो विपक्ष से पहले जनता सड़क पर होती. इस महंगाई ने ग़रीबी पैदा की है तो क्या हुआ, इसने महंगाई का सपोर्टर भी पैदा किया है, दोनों चीज़ें हुई हैं. लोकतंत्र ऐसे ही ख़त्म नहीं होता है, मेहनत लगती है.

देqमंत्री जी का यह बयान जॉर्ज ऑरवेल के 1984 के एक प्रसंग से मिलता है. इस उपन्यास की एक पंक्ति का ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी किया है. 1984 उपन्यास में ओशीनिया के नागरिकों को टेलीस्क्रीन के ज़रिए सूचना दी जाती है. भारत में आप टेलीस्क्रीन को गोदी मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में चल रहे तमाम संदेशों को कह सकते हैं. जॉर्ज ऑरवेल लिख रहे हैं और आपको सुन कर लगेगा कि अरे ये तो सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ वाला लॉजिक है, कहीं यहीं से तो नहीं आया. दिन रात टेलीस्क्रीन से आपके कानों से इसी तरह के आंकड़े टकरा रहे हैं कि पचास साल पहले की तुलना में आज लोगों को अधिक भोजन मिल रहा है, अधिक कपड़े दिए गए हैं, अच्छा घर दिया गया है, मनोरंजन के अच्छे साधन दिए गए हैं. लोगों की उम्र लंबी हो रही है, कम घंटों के लिए काम कर रहे हैं, स्वस्थ्य हैं, मज़बूत हैं, ख़ुश हैं और ज़्यादा बुद्धिमान हैं, बेहतर तरीके से शिक्षित हैं. इसमें एक भी शब्द न साबित किया जा सकता है न ख़ारिज किया जा सकता है.इस तरह के आंकड़ों से पब्लिक स्पेस को भर दिया गया है, इनके बीच पेट्रोल और डीज़ल से त्रस्त जनता की आवाज़ दब सी गई है. दाम बढ़ने के समर्थन में अजीब अजीब तर्क दिए जा रहे हैं. महंगाई के सपोर्टर चलते फिरते टेलीस्क्रीन बन गए हैं. वे कुछ बड़बड़ाते हैं कि मुफ्त अनाज मिल रहा है, मुफ्त टीका मिल रहा है, मुफ्त बीमा मिल रहा है. इसी देश में करोड़ों लोगों को पोलियो का टीका मुफ्त ही मिला. सबको लगने वाले टीके मुफ्त ही लगते हैं. 2018 की एक खबर है टेलिग्राफ की, मूर्ति पर 3000 करोड़ खर्च करने वाली सरकार पोलियो के टीकाकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं से 100 करोड़ मांगेगी.मीडिया रिपोर्ट है कि भारत मनीला स्थित एशियन डेवलपमेंट बैंक और बीजिंग स्थित AIIB से करीब 14000 करोड़ का ऋण लेने जा रहा है. सरकार टीका के लिए लोन भी ले रही है, टीका के नाम पर पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स भी ले रही ह. इससे अच्छा होता सभी पैसे देकर ही टीका लगा लेते. सरकार यह भी नहीं बताती कि कितने लोगों ने पैसे देकर टीका लिया है. हम जैसों ने पैसे दिए हैं मगर गिनती में नहीं हैं. इस लोन की क्यों ज़रूरत पड़ी. यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि मानसून सत्र में पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने संसद में बताया है कि 2019-20 में पेट्रोल और डीज़ल से टैक्स के रूप में 1 लाख 78 हज़ार करोड़ आया. 2020-21 में 3 लाख 35 हज़ार करोड़ हो गया है. एक साल में 88 प्रतिशत की वृद्धि होती है फिर भी सरकार टीके के लिए लोन ले रही है?महामारी से पहले 2018-19 में उत्पाद शुल्क से 2 लाख 3 हज़ार करोड़ जमा हुआ था. इंडियन एक्सप्रेस ने आज संपादकीय में लिखा है कि दो साल में पेट्रोल और डीज़ल से ज्यादातर जमा होने वाला उत्पाद शुल्क में 79 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इस साल अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच 1,71,684 करोड़ जमा हुआ है. दो साल पहले अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच पेट्रोल और डीज़ल से 95,930 करोड़ उत्पाद शुल्क जमा हुआ था.2018 की तुलना में 2020 में हवाई जहाज़ के ईंधन से जमा होने वाला उत्पाद शुल्क घट गया. 2540 करोड़ से घटकर 779 करोड़ हो गया. अगर आप महंगाई से ज़्यादा महंगाई के सपोर्टर से परेशान हैं तो कोई बात नहीं. जब भी महंगाई के सपोर्टर चुप कराने आएं तो बस इतना याद कीजिए कि क्या कभी आप उनके साथ दूसरों को चुप कराया करते थे, इसका जवाब हां में है तो महंगाई के सपोर्टर का फूलों की माला पहनाकर स्वागत कीजिए. सरकार को भी महंगाई के इन सपोर्टरों का सम्मान करना चाहिए, ये अगर नहीं होते तो विपक्ष से पहले जनता सड़क पर होती. इस महंगाई ने ग़रीबी पैदा की है तो क्या हुआ, इसने महंगाई का सपोर्टर भी पैदा किया है, दोनों चीज़ें हुई हैं. लोकतंत्र ऐसे ही ख़त्म नहीं होता है, मेहनत लगती

कर टीके लगवाए हैं और इसकी कुल राशि क्या है?

मंत्री जी का यह बयान जॉर्ज ऑरवेल के 1984 के एक प्रसंग से मिलता है. इस उपन्यास की एक पंक्ति का ज़िक्र सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भी किया है. 1984 उपन्यास में ओशीनिया के नागरिकों को टेलीस्क्रीन के ज़रिए सूचना दी जाती है. भारत में आप टेलीस्क्रीन को गोदी मीडिया और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी में चल रहे तमाम संदेशों को कह सकते हैं. जॉर्ज ऑरवेल लिख रहे हैं और आपको सुन कर लगेगा कि अरे ये तो सत्तर साल में कुछ नहीं हुआ वाला लॉजिक है, कहीं यहीं से तो नहीं आया. 

दिन रात टेलीस्क्रीन से आपके कानों से इसी तरह के आंकड़े टकरा रहे हैं कि पचास साल पहले की तुलना में आज लोगों को अधिक भोजन मिल रहा है, अधिक कपड़े दिए गए हैं, अच्छा घर दिया गया है, मनोरंजन के अच्छे साधन दिए गए हैं. लोगों की उम्र लंबी हो रही है, कम घंटों के लिए काम कर रहे हैं, स्वस्थ्य हैं, मज़बूत हैं, ख़ुश हैं और ज़्यादा बुद्धिमान हैं, बेहतर तरीके से शिक्षित हैं. इसमें एक भी शब्द न साबित किया जा सकता है न ख़ारिज किया जा सकता है.

इस तरह के आंकड़ों से पब्लिक स्पेस को भर दिया गया है, इनके बीच पेट्रोल और डीज़ल से त्रस्त जनता की आवाज़ दब सी गई है. दाम बढ़ने के समर्थन में अजीब अजीब तर्क दिए जा रहे हैं. महंगाई के सपोर्टर चलते फिरते टेलीस्क्रीन बन गए हैं. वे कुछ बड़बड़ाते हैं कि मुफ्त अनाज मिल रहा है, मुफ्त टीका मिल रहा है, मुफ्त बीमा मिल रहा है. इसी देश में करोड़ों लोगों को पोलियो का टीका मुफ्त ही मिला. सबको लगने वाले टीके मुफ्त ही लगते हैं. 2018 की एक खबर है टेलिग्राफ की, मूर्ति पर 3000 करोड़ खर्च करने वाली सरकार पोलियो के टीकाकरण के लिए अंतरराष्ट्रीय दानदाताओं से 100 करोड़ मांगेगी.

मीडिया रिपोर्ट है कि भारत मनीला स्थित एशियन डेवलपमेंट बैंक और बीजिंग स्थित AIIB से करीब 14000 करोड़ का ऋण लेने जा रहा है. सरकार टीका के लिए लोन भी ले रही है, टीका के नाम पर पेट्रोल डीज़ल पर टैक्स भी ले रही ह. इससे अच्छा होता सभी पैसे देकर ही टीका लगा लेते. सरकार यह भी नहीं बताती कि कितने लोगों ने पैसे देकर टीका लिया है. हम जैसों ने पैसे दिए हैं मगर गिनती में नहीं हैं. इस लोन की क्यों ज़रूरत पड़ी. यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि मानसून सत्र में पेट्रोलियम राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने संसद में बताया है कि 2019-20 में पेट्रोल और डीज़ल से टैक्स के रूप में 1 लाख 78 हज़ार करोड़ आया. 2020-21 में 3 लाख 35 हज़ार करोड़ हो गया है. एक साल में 88 प्रतिशत की वृद्धि होती है फिर भी सरकार टीके के लिए लोन ले रही है?

महामारी से पहले 2018-19 में उत्पाद शुल्क से 2 लाख 3 हज़ार करोड़ जमा हुआ था. इंडियन एक्सप्रेस ने आज संपादकीय में लिखा है कि दो साल में पेट्रोल और डीज़ल से ज्यादातर जमा होने वाला उत्पाद शुल्क में 79 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. इस साल अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच 1,71,684 करोड़ जमा हुआ है. दो साल पहले अप्रैल से लेकर सितंबर के बीच पेट्रोल और डीज़ल से 95,930 करोड़ उत्पाद शुल्क जमा हुआ था.

2018 की तुलना में 2020 में हवाई जहाज़ के ईंधन से जमा होने वाला उत्पाद शुल्क घट गया. 2540 करोड़ से घटकर 779 करोड़ हो गया. अगर आप महंगाई से ज़्यादा महंगाई के सपोर्टर से परेशान हैं तो कोई बात नहीं. जब भी महंगाई के सपोर्टर चुप कराने आएं तो बस इतना याद कीजिए कि क्या कभी आप उनके साथ दूसरों को चुप कराया करते थे, इसका जवाब हां में है तो महंगाई के सपोर्टर का फूलों की माला पहनाकर स्वागत कीजिए. सरकार को भी महंगाई के इन सपोर्टरों का सम्मान करना चाहिए, ये अगर नहीं होते तो विपक्ष से पहले जनता सड़क पर होती. इस महंगाई ने ग़रीबी पैदा की है तो क्या हुआ, इसने महंगाई का सपोर्टर भी पैदा किया है, दोनों चीज़ें हुई हैं. लोकतंत्र ऐसे ही ख़त्म नहीं होता है, मेहनत लगती 


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